।। मैं कर्ण हूँ ।।
धर्म जात से अलग मैं एक वर्ण हूँ।
इस कलयुग में क्या में कर्ण हूँ ।।
न पुत्र हूँ सूर्य का , न गुरु परशुराम हैं।
कर्म मेरा कर्ण है तो क्या मैं कर्ण हूँ ।।
युद्ध है द्वंद है सब खुद के है संग है ।
जीत में भी हार है ये कैसा में कर्ण हूँ।।
दान में दु किसे हर कोई है छल रहा ।
उठ रहा प्रश्न है कैसे में कर्ण हूँ।।
कर्म है ज्ञात मुझे धर्म बस यही मेरा ।
अंजान हूँ अधर्म से शायद मैं कर्ण हूँ।।
~ प्रकाश द्विवेदी {Prakash dwivedi}
#Prakashdwivedipoetry

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