Sunday, December 16, 2018

इश्क़ (ISHQ )

https://youtu.be/wo1I-DhkZLc

                                  इश्क़

इश्क़ करो तो उसकीं रूह से करो ,
                                   आबरू से क़्यो करते हो !
 देखो तो दिल में देखो,
                                बदन को क़्यो देखते हो !!


या तो उसे बाग़ के किसी पुष्प की तरह संम्भाल कर रखों!
या  फिर  उसकी  शमा  में  जलकर    राख  हो   जाओ!!


लाख़ बंदिशे लगाई उसकी उड़ान पर,
                                             और काट दिए सारे पंख !
पर क़्या रोक सके उसकी उड़ान को?? 
                                   क़्या रोक सके उसकी उड़ान को!
किसी की रहमतों से नहीं ,
                                   अपने होशलों से बहती है वो !!

उसका समंदर जैसा प्यार भी,
                                तुम्हारी हवस रूपी तृष्णा को न मिटा सका !
तुम  काटते  रहे  सारे  पर ,
                                पर क्या रोक सके उसकी उड़ान को !!


तवायफ तो ढूंढ लेती है, औरतों में , नजरें तुम्हारी!
क़्या कभी तवायफ़ों में औरतों को देखा हैं ??


आशिफ़ा हैं मुनंतजिर, निर्भया हैं मुनंतजिर,
                             के शक्त कानून हो उन शैता क़े लिए !
ये जख्म है कि भरता ही नही,
                                  क़्या ऊस्ल करे आशा के लिए!!

 ओढ़कर चोला शराफ़त का,
                                    यहाँ घूमते है हैवान नकावो में !
न कोख है अब सुरक्षित ,
                                       न आबरू बची हिजाबों में !!


कितनों को तुमने निर्भया कर दिया,
                            कई आशिफाओ को तुमने माटी बना दिया !
इश्क़ करो तो.....................................


कब तक न्याय पुकारोगी तुम,
                                   बिके हुए राजनेताओं से !
कल तक जो अंधा था क़ानून,
                                   आज गूँगा बहरा भी हैं !!


अरे उठों आशिफ़ा , उठों निर्भया, उठों नारियों,
                           वस्त्र संभालो कोई न आगे आएगा !
अरे  छोड़ आभूषण भुजा संभालो,
                                    खुद ही अपना चीर बचालो !! --2...



                           ~ प्रकाश द्विवेदी (Prakash Dwivedi )
                           +918602150751
                            #Prakashdwivedipoetry








                   

Thursday, December 13, 2018

थक गया दिल ये गाते गाते

1

               ||थक गया दिल ये गाते गाते ||



अधरों की ये आधी बातें,
तेरे बिन ये कटती रातें,
सूना सूना यौवन सारा,
सूने सूने दिन भी सारे,
रूठे रूठे रात के तारे,
खोज रहे है चेहरा तेरा,
थके थके से हारे हारे,
जाने कब मेरे जीवन में,
तुम आते आते आओगी,
खामोश लबों को चूम मेरे
कब झूमोगी कब गाओगी,
मैंने कितना शोर किया है,
मैंने कितना तुम्हें पुकारा,
पर तुम न आईं आते आते,
थक गया दिल ये गाते गाते,

क्या याद तुझे भी आती है?
क्या तेरा दिल भी रोता है?
मैं खोल के आँखे सोता हूँ,
क्या तू भी ऐसे सोता है?
मैं रूह गंवा कर जीता हूँ,
क्या तू भी ऐसे जीता है?
मैं आगे चल कर जाऊँगा,
तू पीछे पीछे आ जाना,
अबतक इतना तड़पाया है,
अब और मुझे न तड़पाना,
तेरे जाने से ही जाने कितनी,
मैंने जाग के रातें बिताई है,
संग तेरे है जग महफ़िल,
अपने साथ बड़ी तन्हाई है,
जाने कैसे कैसे सपनो में मैं,
करता रहता हूँ खुद से बातें,
थक गया दिल ये गाते गाते,

सुना है दूजा प्रेम किया है,
मीत नया फिर ढूंढ़ लिया है,
पर अब जो है मीत तुम्हारा,
कब तक का अनुबंध किया है?
बतला के जाओ जाना है तो,
कब तक मैं बैठूं इंतज़ार में,
ये तड़पन भी अब तड़प उठी,
क्या क्या अब सहूँ प्यार में,
अब है आधा जीवन सारा,
सब कुछ तो तुझपे है वारा,
कैसे मोल चुकाओगी तुम,
अब तक जितने अश्रु बहे है,
प्रेम के अश्रु धारा की,
धन्य वही है इस संसार में,
प्रेम में जिसने ये दर्द सहे हैं,
बीत रहा ये सावन भी अब,
प्रेम ने अब ये व्यथा कही हैं,
बादल भी अब व्यथा सुनाते,
थक गया दिल ये गाते गाते..



~ प्रकाश द्विवेदी 
Prakash dwivedi
+918602150751
#prakashdwivedipoetry


Wednesday, December 12, 2018

मैं कर्ण हूँ

                             ।। मैं कर्ण हूँ ।।

धर्म जात से अलग मैं एक वर्ण हूँ।
इस कलयुग में क्या में कर्ण हूँ  ।।

न पुत्र हूँ सूर्य का , न गुरु परशुराम हैं।
कर्म मेरा कर्ण है तो क्या मैं कर्ण हूँ ।।

युद्ध है द्वंद है सब खुद के है संग है ।
जीत में भी हार है ये कैसा में कर्ण हूँ।।

दान में दु किसे हर कोई है छल रहा ।
उठ रहा प्रश्न है कैसे में कर्ण हूँ।।

कर्म है ज्ञात मुझे धर्म बस यही मेरा ।
अंजान हूँ अधर्म से शायद मैं कर्ण हूँ।।

                             ~ प्रकाश द्विवेदी {Prakash dwivedi}
                                                       
                                                            +918602150751
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Saturday, October 27, 2018

कल रात भर बेबस मेरे ये नयन रोते रहे !!

कल रात भर बेबस मेरे ये नयन रोते रहे,
तुम गयीं तो  वेदना के बीज ये बोते रहे,

मैं जोड़ सका न फिर वो,
हृदय जो तुमने तोड़ दिया,
कितनी पथरीली राहों में,
तुमने तो तन्हा छोड़ दिया,
कितने आशाओं के मोती,
गम के सागर में डूब गए,
तकते तकते राह तुम्हारी,
मन के सारे पंछी ऊब गए,

और तुम्हारे नैनों में मुस्काने से ही,
कल्पनाओं में तुम्हारी ये नयन खोते रहे,
तुम गयीं तो वेदना के बीज ये बोते रहे,

एक नदी सी बह गयीं तुम,
एक पर्वत सा ढह गया मैं,
कुछ भी न सुन पायीं तुम,
और सब कुछ कह गया मैं,
इतनी सी ये बात नहीं थी,
मन के सारे संबल टूट गए,
इस प्रेम की मर्यादा खातिर,
मेरे कितने अपने छूट गए,

और तुम्हारी यादों के यूँ आने से ही,
विरह की आग में भस्म ये नयन होते रहे,
तुम गयीं तो वेदना के बीज ये बोते रहे,

इस एक अंतिम बार सही तुम,
मुझको बाहों में भरने आ जाना,
माँ का जो कंगन भेंट किया था,
आड़े हाथों मुझको लौटा जाना,
कितना भी अब तुम हमे पुकारो,
अब तुमसे हम मिलने न आएंगे,
वो सारी गलियाँ वो सारे पथ,
जिस ओर मुड़ो तुम मुड़ जायेंगे,

तुमसे बिछड़ के गीत सुनाने से ही,
प्यार सारा अश्रुओं से ये नयन धोते रहे,
तुम गयीं तो वेदना के बीज ये बोते रहे,

                                            ~ Prakash dwivedi
                                                प्रकाश द्विवेदी
                                                +918602150751